न्यूज़ टुडे नालंदा -योग को मजहब से जोड़ना गलत “योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है ,,,,,

दीपक विश्वकर्मा ( 9334153201 ) योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है; मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है; विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है। यह व्यायाम के बारे में नहीं है, लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है। हमारी बदलती जीवन- शैली में यह चेतना बनकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है।
पिछले साल भारत में इस दिवस को लेकर काफी बवाल मचा था। कुछ कट्टर धार्मिक संगठन ने मोदी सरकार पर इस दिन को थोपने का आरोप लगाया था। धर्म के ठेकेदारों ने तो यहां तक कहा था कि कि योग करने से इंसान हिंदू बन जाता है क्योंकि ये हिंदू धर्म की देन है, इस कारण इस्लामिक लोगों को इससे दूर रहना चाहिए।लेकिन अगर आप ‘योग’ के बारे में पढ़ेंगे तो जानेंगे कि ‘योग’ किसी खास मजहब से संबधित नहीं है बल्कि यह एक आध्यात्मिक प्रकिया है जिसे करने से चित्त शांत और शारीरिक लाभ होता है। इस्लाम धर्म में ‘योग’ को ध्यान से जोड़ा गया है इस्लाम धर्म में भी कहा गया है कि सूफी संगीत के विकास में ‘भारतीय योग’ का काफी बड़ा हाथ है क्योंकि योग मन की चंचलता पर रोक लगाता है और ईश्वर के ध्यान में मदद करता है।
सूफी संगीत तो ईश्वर की इबादत है और इस इबादत को बल देता है ‘योग’। मिस्र् में ‘योग’ को ‘इस्लामी व्यायाम’ करार दिया गया अब थोड़ा इतिहास पर गौर किया जाये तो आप पायेंगे कि मिस्र् में ‘योग’ को ‘इस्लामी व्यायाम’ करार दिया गया था और ‘नमाज’ को ‘योग’ और ‘योग’ को ‘नमाज’ बताया गया था क्योंकि ‘योग’ में मन -मस्तिष्क पर संयम रखा जाता है और ‘नमाज’ में भी यही होता है। ‘नमाज’ में ‘योग’ और ‘योग’ में ‘नमाज’ अशरफ एफ निजामी ने ‘योग’ विषय पर एक किताब भी लिखी है जिसमें उन्होंने ‘नमाज’ और ‘योग’ को एक बताते हुए लिखा है कि जिस तरह से ‘नमाज’ पढ़ने से पहले ‘वजू’ की प्रथा है ठीक उसी तरह से ‘योग’ करने से पहले कहा जाता है कि इंसान ‘शौच’ करके आये। आशय दोनों का शारीरिक सफाई से ही है।
‘नमाज’ से पहले इंसान ‘नियत’ करता है तो योग करने से पहले ‘संकल्प’ लिया जाता है। जब नमाज ‘कयाम’ के रूप में अता की जाती है तो वो वज्रआसन होता है। नमाज में भी ‘ध्यान’ और ‘योग’ में भी नमाज में भी ‘ध्यान’ लगाया जाता है और ‘योग’ में भी यही होता है। ‘सजदा’ करने के लिए इंसान जैसे एक्शन लेता है वो योग में ‘शशंक आसन’ कहा जाता है, जिससे हार्ट और बीपी कंट्रोल में रहते हैं। शारीरिक और मानसिक परेशानियों से मुक्ति दिलाता है ‘योग’ इसलिए ‘योग’ का अर्थ केवल शारीरिक और मानसिक परेशानियों से मुक्ति पाने से है ना कि किसी धर्म विशेष से इसलिए इस्लामिक देशों में ‘योग’ को गलत नहीं माना गया है। हालांकि ये और बात है कि कुछ कट्टरपंथियों ने इस किसी समुदाय और धर्म विशेष से जोड़ दिया है।बाबजूद इसके आज भारत ही नहीं वल्कि विश्व के कई देशो के इस्लाम धर्म को मानने  वाले लोगो ने योग को अपनाया है जिससे उन्हें स्वास्थ्य लाभ हो रहा है | धीरे धीरे लोगो में योग के प्रति भ्रांतियां दूर होती  जा रही है | 

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